Physical Address
304 North Cardinal St.
Dorchester Center, MA 02124
Physical Address
304 North Cardinal St.
Dorchester Center, MA 02124

डिजिटल लेन-देन पर लगने वाले शुल्कों को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है। जानें क्या सामान्य यूपीआई ट्रांसफर अब भी मुफ्त रहेंगे या नहीं।
भारत में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी यूपीआई आज रोजमर्रा की जिंदगी का एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है। चाय की दुकान से लेकर बड़े शॉपिंग मॉल तक, नकद भुगतान की जगह लोग डिजिटल माध्यम को प्राथमिकता दे रहे हैं। हाल के दिनों में यूपीआई लेन-देन पर संभावित शुल्क और मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) को लेकर व्यापक चर्चा शुरू हो गई है, जिससे आम उपयोगकर्ताओं और छोटे कारोबारियों में चिंता का माहौल देखा जा रहा है।
डिजिटल वित्तीय ढांचे के विस्तार के साथ ही यह बहस तेज हो गई है कि इस विशाल व्यवस्था को चलाने की लागत कौन वहन करेगा। नियामक संस्थाओं और भुगतान सेवा प्रदाताओं के बयानों के बीच यह समझना आवश्यक है कि इन नियमों का वास्तविक प्रभाव किस पर पड़ेगा और क्या आम उपभोक्ता की जेब पर कोई अतिरिक्त बोझ आने वाला है।
यूपीआई प्रणाली की शुरुआत से ही इसका सबसे बड़ा आकर्षण इसका पूरी तरह से निःशुल्क होना रहा है। हालांकि, तकनीकी ढांचे को सुरक्षित रखने, सर्वर क्षमता बढ़ाने और साइबर धोखाधड़ी रोकने के लिए वित्तीय संस्थानों को लगातार भारी निवेश करना पड़ता है। बैंक और पेमेंट सेवा कंपनियां लंबे समय से यह मांग करती रही हैं कि इस सेवा की लागत की भरपाई के लिए एक टिकाऊ वित्तीय मॉडल विकसित किया जाए।
जब भी डिजिटल लेन-देन पर किसी भी प्रकार के शुल्क या इंटरचेंज फीस की बात सामने आती है, तो बाजार में यह आशंका फैल जाती है कि कहीं हर छोटे-बड़े ट्रांसफर पर पैसे तो नहीं कटेंगे। भुगतान तंत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि बुनियादी ढांचे के रखरखाव के लिए राजस्व मॉडल जरूरी है, लेकिन यह आम उपयोगकर्ताओं की पहुंच को सीमित करने वाला नहीं होना चाहिए।
नियामक दिशा-निर्देशों के अनुसार, सामान्य व्यक्ति-से-व्यक्ति (P2P) लेन-देन और सामान्य व्यक्ति-से-व्यापारी (P2M) बैंक खातों के सीधे ट्रांसफर पर कोई अतिरिक्त चार्ज नहीं लगाया गया है। भ्रम की स्थिति मुख्य रूप से प्रीपेड पेमेंट इंस्ट्रूमेंट्स (PPI) यानी डिजिटल वॉलेट के जरिए होने वाले लेन-देन को लेकर पैदा हुई है।
जब कोई उपभोक्ता किसी वॉलेट या क्रेडिट लाइन का उपयोग करके किसी बड़े मर्चेंट को एक निश्चित सीमा से अधिक का भुगतान करता है, तो वहां इंटरचेंज शुल्क लागू करने का प्रावधान किया गया है। यह व्यवस्था सीधे तौर पर कार्ड नेटवर्क की तरह काम करती है, जहां लागत का वहन मर्चेंट या सेवा प्रदाता द्वारा किया जाता है, न कि सीधे तौर पर भुगतान करने वाले ग्राहक द्वारा।
छोटे और मध्यम वर्ग के खुदरा व्यापारियों में इस बात को लेकर संशय बना हुआ है कि क्या डिजिटल माध्यम अपनाने की वजह से उनका मुनाफा घटेगा। यदि मर्चेंट डिस्काउंट रेट या अन्य सेवा शुल्क बढ़ते हैं, तो कारोबारियों के पास दो ही विकल्प बचते हैं: या तो वे इस लागत को स्वयं झेलें या फिर इसका बोझ अंतिम उपभोक्ता पर डालें।
डिजिटल भुगतान पर किसी भी तरह के संभावित शुल्क की खबर आते ही राजनीतिक गलियारों में भी बयानबाजी तेज हो जाती है। विपक्षी दलों का तर्क रहा है कि नोटबंदी और कैशलेस अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के बाद यदि डिजिटल लेनदेन पर शुल्क लगाया गया, तो यह निम्न और मध्यम आय वर्ग के साथ-साथ छोटे दुकानदारों पर सीधा प्रहार होगा।
दूसरी ओर, सरकार और संबंधित वित्तीय प्राधिकरणों ने बार-बार स्पष्ट किया है कि जनहित को ध्यान में रखते हुए डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना प्राथमिकता है। नीति निर्माताओं का रुख यह रहा है कि डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचा नागरिकों के लिए सुलभ और किफायती बना रहना चाहिए ताकि वित्तीय समावेशन के लक्ष्य को झटका न लगे।
आने वाले समय में डिजिटल भुगतान क्षेत्र को एक संतुलित नीति की आवश्यकता होगी। भुगतान कंपनियों को नवाचार और सुरक्षा जारी रखने के लिए पूंजी की जरूरत है, जबकि उपभोक्ताओं को यह भरोसा चाहिए कि उनकी रोजमर्रा की डिजिटल आदतें महंगी नहीं होंगी।
विशेषज्ञों के अनुसार, सरकार सब्सिडी या प्रोत्साहन योजनाओं के जरिए बैंकों की लागत की भरपाई करने के मॉडल पर विचार करती रही है। इससे बैंकों पर दबाव भी कम होता है और जनता के लिए व्यवस्था मुफ्त बनी रहती है। भविष्य में किसी भी नीतिगत बदलाव से पहले व्यापक जन-सहमति और स्पष्ट संवाद बेहद जरूरी साबित होगा।
नहीं, सामान्य बैंक खाते से बैंक खाते में किए जाने वाले व्यक्ति-से-व्यक्ति या व्यक्ति-से-व्यापारी भुगतान पूरी तरह से निःशुल्क हैं और इन पर कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लगता।
नहीं, ग्राहक के लिए क्यूआर कोड स्कैन करके भुगतान करना पूरी तरह फ्री है। किसी भी तरह का इंटरचेंज शुल्क यदि लागू होता भी है, तो वह मर्चेंट स्तर पर होता है, ग्राहक से नहीं लिया जाता।
नहीं, यह नियम केवल प्रीपेड वॉलेट और कुछ विशिष्ट व्यावसायिक लेन-देन के लिए तय दिशा-निर्देशों से जुड़ा है। बैंक खाते से सीधे किए जाने वाले नियमित भुगतान पर यह लागू नहीं होता।
यूपीआई पर शुल्कों को लेकर फैलने वाली खबरें अक्सर तकनीकी बारीकियों की अधूरी समझ का परिणाम होती हैं। वर्तमान नियमों के तहत आम नागरिक के लिए यूपीआई का दैनिक उपयोग पहले की तरह ही मुफ्त और सहज बना हुआ है। किसी भी अफवाह पर ध्यान देने से पहले आधिकारिक दिशा-निर्देशों और बैंक की सूचनाओं की पुष्टि करना ही सबसे सही तरीका है।
स्रोत: यह रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के आधार पर तैयार की गई है। मूल कवरेज: BBC.
फ़ोटो: Rajesh S Balouria / Pexels