ब्रिक्स साझा करेंसी पर भारत का रुख साफ, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने पर जोर

ब्रिक्स साझा करेंसी पर भारत का रुख साफ, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने पर जोर

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बीच साझा करेंसी के प्रस्ताव और वैश्विक व्यापार में डॉलर के विकल्प को लेकर भारत सरकार ने अपनी स्थिति स्पष्ट की है।

वैश्विक मंच पर ब्रिक्स (BRICS) समूह के विस्तार और इसकी आर्थिक नीतियों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। हाल ही में संपन्न हुए शिखर सम्मेलन के दौरान यह सवाल प्रमुखता से उठा कि क्या सदस्य देश अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए किसी साझा करेंसी (साझा मुद्रा) पर विचार कर रहे हैं। इस विषय पर भारत सरकार ने अपना रुख पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है, जिससे वैश्विक बाजार और कूटनीतिक हलकों में चल रही अटकलों पर विराम लग गया है।

भारतीय विदेश मंत्रालय और नीति निर्माताओं के अनुसार, भारत फिलहाल किसी भी तरह की साझा ब्रिक्स करेंसी के पक्ष में नहीं है। इसके बजाय, भारत का पूरा ध्यान द्विपक्षीय व्यापार में अपनी राष्ट्रीय मुद्रा यानी भारतीय रुपये (INR) और अन्य सदस्य देशों की स्थानीय मुद्राओं के उपयोग को मजबूत करने पर केंद्रित है। इस फैसले के पीछे भारत की अपनी आर्थिक प्राथमिकताएं और भू-राजनीतिक रणनीतियां काम कर रही हैं।

साझा करेंसी पर भारत की असहमति के मुख्य कारण

भारत का मानना है कि एक साझा करेंसी को लागू करना व्यावहारिक रूप से बेहद जटिल है। यूरोपीय संघ के ‘यूरो’ के अनुभव से यह स्पष्ट है कि साझा मुद्रा के लिए सभी सदस्य देशों की राजकोषीय नीतियों और मौद्रिक प्राथमिकताओं में गहरा तालमेल होना आवश्यक है। ब्रिक्स देशों (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका, और अब नए शामिल देश) की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, साझा करेंसी आने से समूह के भीतर सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के नाते चीन का प्रभाव अत्यधिक बढ़ सकता है। भारत अपनी संप्रभुता और आर्थिक नीतियों पर किसी भी बाहरी प्रभाव को स्वीकार नहीं करना चाहता। इसलिए, नई दिल्ली ने स्पष्ट किया है कि वह किसी नई करेंसी के निर्माण के बजाय मौजूदा वित्तीय प्रणालियों को अधिक लचीला बनाने की पक्षधर है।

स्थानीय मुद्राओं में लेनदेन को प्राथमिकता

भारत सरकार लगातार इस बात पर जोर दे रही है कि सदस्य देशों को आपस में व्यापार करने के लिए अपनी घरेलू मुद्राओं का उपयोग करना चाहिए। इससे लेनदेन की लागत में कमी आएगी और अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता भी धीरे-धीरे कम होगी। भारत पहले ही रूस, यूएई और कुछ अन्य देशों के साथ रुपये में व्यापार करने के लिए समझौते कर चुका है।

  • लेनदेन शुल्क में कमी: स्थानीय मुद्रा में व्यापार करने से मुद्रा परिवर्तन (कनवर्जन) का अतिरिक्त खर्च बचता है।
  • आर्थिक संप्रभुता: राष्ट्रीय मुद्राओं के उपयोग से देशों की अपनी मौद्रिक नीतियों पर नियंत्रण बना रहता है।
  • भुगतान प्रणालियों का एकीकरण: भारत अपनी यूपीआई (UPI) प्रणाली को अन्य देशों के भुगतान तंत्र से जोड़ने पर काम कर रहा है।

नई दिल्ली डिक्लेरेशन और आम सहमति का निर्माण

ब्रिक्स बैठकों के दौरान विभिन्न मुद्दों पर आम सहमति बनाना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है, विशेषकर तब जब चीन और रूस जैसे देशों के भू-राजनीतिक हित पश्चिमी देशों के विपरीत हों। भारत ने हमेशा एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है। नई दिल्ली डिक्लेरेशन (घोषणापत्र) में आर्थिक सहयोग, आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई और बहुपक्षीय संस्थानों में सुधार जैसे मुद्दों पर सहमति बनी थी।

कूटनीतिक सूत्रों के मुताबिक, भारत ने यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई कि घोषणापत्र का रुख किसी भी देश या ब्लॉक के खिलाफ आक्रामक न हो। भारत ने विकासशील देशों (ग्लोबल साउथ) की आवाज को बुलंद करने और आर्थिक विकास को प्राथमिकता देने वाले एजेंडे पर सभी सदस्य देशों को एक साथ लाने में सफलता हासिल की।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

क्या ब्रिक्स देश कभी अपनी साझा करेंसी लॉन्च करेंगे?

वर्तमान में इसकी संभावना बहुत कम है। भारत सहित कई प्रमुख सदस्य देश साझा करेंसी के पक्ष में नहीं हैं। वर्तमान फोकस केवल स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने पर है।

डॉलर पर निर्भरता कम करने से भारत को क्या लाभ होगा?

इससे वैश्विक बाजार में डॉलर की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव से भारतीय अर्थव्यवस्था सुरक्षित रहेगी और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम होगा।

क्या ब्रिक्स के विस्तार से भारत के प्रभाव पर असर पड़ेगा?

नए देशों के शामिल होने से ब्रिक्स का दायरा बढ़ा है। भारत इसे एक सकारात्मक कदम मानता है, बशर्ते समूह का उपयोग किसी विशेष देश के राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए न किया जाए।

Bottom Line

ब्रिक्स के मंच पर भारत की रणनीति पूरी तरह से व्यावहारिक और राष्ट्रीय हितों से प्रेरित है। साझा करेंसी के विचार से दूरी बनाकर और स्थानीय मुद्राओं को बढ़ावा देकर भारत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह वैश्विक आर्थिक सुधारों का समर्थन करता है, लेकिन अपनी आर्थिक स्वतंत्रता की कीमत पर नहीं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अन्य सदस्य देश भारत के इस दृष्टिकोण के साथ कितनी तेजी से तालमेल बिठा पाते हैं।

स्रोत: यह रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के आधार पर तैयार की गई है। मूल कवरेज: Navbharat Times.

फ़ोटो: Werner Pfennig / Pexels

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