Physical Address
304 North Cardinal St.
Dorchester Center, MA 02124
Physical Address
304 North Cardinal St.
Dorchester Center, MA 02124

सऊदी अरब पर हमलों के बाद मक्का समझौते की प्रभावशीलता और पाकिस्तान की रक्षा नीति पर कूटनीतिक गलियारों में नई बहस छिड़ गई है।
पश्चिम एशिया में बढ़ते क्षेत्रीय तनाव और सऊदी अरब के महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों को निशाना बनाकर किए गए हमलों ने वैश्विक कूटनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा सुरक्षा चुनौतियों के बढ़ने के बाद रियाद अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा रणनीति की समीक्षा कर रहा है। इस पूरे घटनाक्रम ने दशकों पुराने मक्का समझौते (मक्का पैक्ट) की प्रासंगिकता और रक्षा समझौतों की वास्तविक क्षमता पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
विशेष रूप से पाकिस्तान की प्रतिक्रिया और उसके द्वारा अपनाए गए रक्षात्मक रुख ने अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों का ध्यान आकर्षित किया है। इस्लामाबाद ने स्पष्ट किया है कि उसका रुख मुख्य रूप से रक्षात्मक सहयोग तक ही सीमित है। इस बीच, स्थिति को नियंत्रित करने के लिए चीन और ईरान जैसे अन्य वैश्विक व क्षेत्रीय खिलाड़ियों की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण हो गई है, जिससे इस संकट के कूटनीतिक मायने और गहरे हो गए हैं।
सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच ऐतिहासिक रूप से बेहद मजबूत सैन्य और रणनीतिक संबंध रहे हैं। ‘मक्का पैक्ट’ या द्विपक्षीय रक्षा समझौतों की जड़े इसी सुरक्षा साझेदारी से जुड़ी हुई हैं। इसके तहत पाकिस्तान ने हमेशा सऊदी अरब की क्षेत्रीय अखंडता और इस्लामी पवित्र स्थलों—मक्का और मदीना—की सुरक्षा के लिए अपनी प्रतिबद्धता जताई है।
हालांकि, इस समझौते की सीमाएं तब स्पष्ट होती हैं जब सऊदी अरब को यमन के हूती विद्रोहियों जैसे गैर-राज्य अभिनेताओं (Non-state actors) से प्रत्यक्ष खतरे का सामना करना पड़ता है। विश्लेषकों का मानना है कि इन समझौतों का स्वरूप काफी हद तक प्रतीकात्मक और रक्षात्मक है, जिसे किसी दूसरे देश के गृहयुद्ध या क्षेत्रीय संघर्ष में प्रत्यक्ष रूप से कूदने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
सऊदी अरब पर हुए हालिया हमलों के बाद जब सैन्य सहायता की उम्मीदें बढ़ीं, तो पाकिस्तान ने बेहद सावधानीपूर्वक अपना रुख स्पष्ट किया। इस्लामाबाद ने यह संकेत दिया कि उसकी सैन्य भूमिका पूरी तरह से रक्षात्मक प्रकृति की है और वह सऊदी सीमाओं के बाहर किसी भी आक्रामक सैन्य अभियान का हिस्सा नहीं बनेगा।
पाकिस्तान की इस हिचकिचाहट के पीछे कई घरेलू और कूटनीतिक कारण हैं:
यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब और लाल सागर के समुद्री मार्गों को निशाना बनाए जाने से अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भारी असर पड़ा है। सऊदी अरब लंबे समय से हूती विद्रोहियों के मिसाइल और ड्रोन हमलों से अपने तेल प्रतिष्ठानों और शहरों की सुरक्षा में जुटा हुआ है।
रियाद ने हमेशा इन हमलों के पीछे ईरान के समर्थन का आरोप लगाया है। यद्यपि हाल के महीनों में सऊदी अरब और ईरान के बीच चीन की मध्यस्थता से राजनयिक संबंध बहाल हुए थे, लेकिन हूती विद्रोहियों की ओर से जारी हमलों ने उस नाजुक शांति प्रक्रिया को फिर से खतरे में डाल दिया है।
पश्चिम एशिया के इस संकट को हल करने में वैश्विक शक्तियों की भूमिका महत्वपूर्ण होती जा रही है। चीन, जो इस क्षेत्र से बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करता है, शांति बनाए रखने के लिए उत्सुक है। रिपोर्टों के अनुसार, बीजिंग ने तेहरान पर दबाव बनाया है कि वह हूती विद्रोहियों को लाल सागर में वाणिज्यिक जहाजों और पड़ोसी देशों पर हमले रोकने के लिए कहे।
चीन का मानना है कि इस क्षेत्र में अस्थिरता से उसकी महत्वाकांक्षी आर्थिक योजनाओं और ऊर्जा सुरक्षा को भारी नुकसान पहुंच सकता है। दूसरी ओर, ईरान भी वैश्विक दबाव के बीच अपने कूटनीतिक संतुलन को बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।
पश्चिम एशिया में होने वाली किसी भी बड़ी उथल-पुथल का भारत पर सीधा असर पड़ता है। भारत के सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे खाड़ी देशों के साथ-साथ ईरान से भी गहरे संबंध हैं। इसके अलावा:
भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के एक बड़े हिस्से के लिए खाड़ी देशों पर निर्भर है। यदि सऊदी बुनियादी ढांचे पर हमले बढ़ते हैं, तो वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आ सकता है, जिससे भारत का आयात बिल बढ़ेगा। साथ ही, लाल सागर में सुरक्षा संकट से भारतीय जहाजों का व्यापारिक मार्ग प्रभावित होता है, जिससे माल ढुलाई का खर्च बढ़ जाता है।
यह समझौता सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच एक द्विपक्षीय सुरक्षा साझेदारी है, जिसका उद्देश्य सऊदी अरब की क्षेत्रीय अखंडता और पवित्र इस्लामी स्थलों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
पाकिस्तान अपनी तटस्थता नीति, ईरान के साथ संबंधों को संतुलित रखने की आवश्यकता और घरेलू आर्थिक एवं सुरक्षा चुनौतियों के कारण किसी विदेशी युद्ध में सीधे शामिल होने से बच रहा है।
इन हमलों से लाल सागर का अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार बाधित होता है, कच्चे तेल की आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होती है और वैश्विक स्तर पर माल ढुलाई की लागत बढ़ जाती है।
सऊदी अरब पर हुए हालिया हमलों और उसके बाद पाकिस्तान की सतर्क प्रतिक्रिया ने यह साबित कर दिया है कि आधुनिक कूटनीति में पारंपरिक रक्षा समझौते अक्सर जमीनी हकीकत के सामने सीमित साबित होते हैं। कोई भी देश अपने राष्ट्रीय हितों और क्षेत्रीय संतुलन को खतरे में डालकर दूसरे देश के युद्ध में उतरने से बचता है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि चीन और अन्य वैश्विक शक्तियां इस क्षेत्र में शांति स्थापित करने के लिए ईरान और हूती विद्रोहियों को किस हद तक राजी कर पाती हैं।
स्रोत: यह रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के आधार पर तैयार की गई है। मूल कवरेज: Hindustan.
फ़ोटो: Ivan Hassib / Pexels