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पश्चिम बंगाल उपचुनाव से पहले चुनाव आयोग ने तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिन्ह के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। दोनों गुटों से नए विकल्प मांगे गए हैं।
पश्चिम बंगाल में आगामी उपचुनावों से ठीक पहले राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। निर्वाचन आयोग ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए तृणमूल कांग्रेस (TMC) के आधिकारिक नाम और उसके प्रसिद्ध चुनाव चिन्ह के उपयोग पर अंतरिम रोक लगा दी है। आयोग का यह फैसला पार्टी के भीतर चल रहे अंदरूनी विवाद और दो अलग-अलग धड़ों द्वारा चुनाव चिन्ह पर दावा ठोकने के बाद आया है।
चुनावी नियमों के अनुसार, जब तक किसी दल के असली हकदार का फैसला नहीं हो जाता, तब तक आयोग संबंधित नाम और चिन्ह को ‘फ्रीज’ कर देता है। इस स्थिति में पार्टी के दोनों गुटों को उपचुनाव के लिए नए नाम और नए प्रतीक चिन्हों का चयन करना होगा, जिससे आने वाले चुनाव में मुकाबला और अधिक दिलचस्प हो गया है।
निर्वाचन आयोग के सामने जब किसी पंजीकृत राजनीतिक दल में स्पष्ट विभाजन की स्थिति उत्पन्न होती है और दोनों पक्ष खुद को मुख्य पार्टी बताते हुए मूल चिन्ह पर अपना अधिकार जताते हैं, तो आयोग को हस्तक्षेप करना पड़ता है। आयोग का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि मतदाताओं के बीच किसी प्रकार का भ्रम न फैले और चुनावी प्रक्रिया निष्पक्ष रूप से संपन्न हो सके।
आयोग ने दोनों पक्षों को निर्देश दिया है कि वे अपनी-अपनी पसंद के तीन नए नाम और तीन नए चुनाव चिन्हों की सूची प्राथमिकता के आधार पर प्रस्तुत करें। इनमें से उपलब्ध विकल्पों के आधार पर आयोग दोनों धड़ों को अलग-अलग नाम और चिन्ह आवंटित करेगा, जिसके तहत वे अपने उम्मीदवार मैदान में उतार सकेंगे।
भारत में राजनीतिक दलों के चुनाव चिन्ह आवंटन और उससे जुड़े विवादों का निपटारा ‘चुनाव चिन्ह (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968’ के तहत किया जाता है। इसकी धारा 15 आयोग को यह अधिकार देती है कि वह प्रतिद्वंद्वी गुटों के दावों का परीक्षण करे।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस का चुनाव चिन्ह बेहद लोकप्रिय माना जाता रहा है। ऐसे में अचानक चिन्ह और नाम बदलने से पार्टी के दोनों धड़ों को अपने कैडर और आम मतदाताओं तक नए चिन्ह की पहचान पहुंचाने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी। चुनावी अभियानों में समय कम होने के कारण यह स्थिति राजनीतिक दलों के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस घटनाक्रम से उपचुनाव के दौरान जमीनी स्तर पर भ्रम की स्थिति बन सकती है। विपक्षी दलों को भी इस स्थिति का राजनीतिक लाभ उठाने का मौका मिल सकता है, क्योंकि सत्तारूढ़ खेमे को अपनी नई पहचान स्थापित करने में अतिरिक्त संसाधन और समय लगाना पड़ेगा।
भारतीय चुनावी इतिहास में यह पहला मौका नहीं है जब किसी बड़ी राजनीतिक पार्टी का नाम और निशान फ्रीज हुआ हो। इससे पहले भी राष्ट्रीय और राज्य स्तर के कई प्रमुख दलों में टूट के बाद चुनाव आयोग ने इस प्रकार के कड़े कदम उठाए हैं।
दशकों पहले कांग्रेस पार्टी में हुए विभाजन के समय भी मूल चिन्ह को फ्रीज किया गया था। हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी, बिहार में लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) और महाराष्ट्र में शिवसेना व राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के विवादों में भी आयोग ने इसी कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए अंतरिम आदेश जारी किए थे।
नहीं, यह एक अंतरिम व्यवस्था है। आयोग द्वारा दोनों धड़ों के संगठनात्मक और विधायी बहुमत से जुड़े सबूतों की समीक्षा करने के बाद अंतिम फैसला लिया जाएगा कि मूल नाम और चिन्ह किस गुट को मिलेगा।
दोनों धड़ों को चुनाव आयोग द्वारा सौंपे गए नए अस्थायी नाम और नए मुक्त प्रतीकों (फ्री सिम्बल्स) के आधार पर ही अपने प्रत्याशी घोषित करने होंगे और प्रचार करना होगा।
हां, निर्वाचन आयोग के किसी भी आदेश या फैसले के खिलाफ प्रभावित पक्ष सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) या संबंधित उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर सकते हैं।
पश्चिम बंगाल के उपचुनावों से ठीक पहले तृणमूल कांग्रेस के नाम और निशान का फ्रीज होना राज्य की राजनीति में एक नया मोड़ ले आया है। इससे न केवल चुनावी रणनीतियों में बदलाव आएगा, बल्कि मतदाताओं के लिए भी नए प्रतीकों को समझना एक अहम पहलू होगा। अब सभी की निगाहें चुनाव आयोग द्वारा दोनों गुटों को आवंटित किए जाने वाले नए नाम और चिन्हों पर टिकी हैं।
स्रोत: यह रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के आधार पर तैयार की गई है। मूल कवरेज: Dainik Bhaskar.
फ़ोटो: Shantum Singh / Pexels